तकनीकी चिट्ठा

आपके जीवन के तकनीकी पहलुओं को छूने की कोशिश

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मैं और हिन्दी लेखन .

Posted by कमल on अप्रैल 19, 2007

रवि जी ने कुछ रैगिंग लेने के अंदाज में पूछा …. “चलिए हमें बताएं कि आप इस चिट्ठे पर हिन्दी में कैसे लिखते हैं, सरल तरीका क्या है और यदि आप लिनक्स में हिन्दी लिखने का कोई सरल तरीका बता सकते हैं तो बताएं ” . ये रैगिंग भी थी और मेरी क्षमताओं को जानने की कोशिश भी.

रवि जी भले ही मुझे ना जानते हों पर मैं उन्हें जानता हूँ विभिन्न कंप्यूटर पत्रिकाओं में छ्पते उनके लेखों से. अभी इसी महीने “लिनक्स फॉर यू” में भी उनका लेख छ्पा है . उनका लिनक्स के हिन्दी-करण में भी काफी योगदान रहा है. तो वो यदि पूछें लिनक्स और हिन्दी के बारे में थोड़ा आश्चर्य होता है. ये सवाल तो मैने आपसे पूछ्ना है रवि जी. वैसे उन्मुक्त जी भी बता सकते हैं. जहां तक मेरा सवाल है मैं बताता हूँ अपने बारे में ( ज्ञानदत्त पाण्डे जी भी यही जानना चाहते हैं ).

मेरा कंप्यूटर और हिन्दी से बहुत पुराना नाता है. मैं चिट्ठाजगत ( हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ) से अरसे से जुड़ा हुआ हूँ लेकिन सिर्फ एक पाठक की हैसियत से. इसलिये लगभग सभी को इस माध्यम से जानता हूँ. जहां तक हिन्दी की बात है हिन्दी मेरी मातृभाषा है . कंप्यूटर पर हिन्दी की जरूरत मुझे पड़ी सन 1996 में . मैं एक मैनुफेक्चरिंग कंपनी में काम करता था वहां हम लोग मजदूरों के लिये ट्रेनिंग मैनुअल बनाते थे जो कि हिन्दी में होते थे . ये सब उन दिनों बाहर से टाइप करवाने पड़ते थे. इसमें एक तो समय बहुत लगता था और फिर एक बार बनने के बाद उनको बदलना बहुत मुश्किल होता था .तो हम चाहते थे कि इसको कंप्यूटर में ले के आना . उस समय माइक्रोसोफट वर्ड उतना पॉपुलर नहीं था . हम लोग ‘एमि प्रो’ और ‘फ्री लांस ग्राफिक्स’ इस्तेमाल में लाते थे . उस समय किसी स्थानीय कंपनी से हमने कुछ सोफ्टवेयर लिया जो कि ‘रैमिंगटन क़ी बोर्ड’ पर चलता था. इसको इस्तेमाल करने मे काफी समस्या आती थी. अप्रेल 1998 (शायद) में चिप’ पत्रिका का पहला अंक आया था ( ये ‘चिप’ के ‘चिप-इंडिया’ बनने और ‘डिजिट’ के आने से काफी पहले की बात थी ) उसमें भारत-भाषा के प्रोजेक्ट के बारे में जानकारी दी गयी थी और साथ में ‘शुशा’ फोंट भी थे . तब से ही में ‘शुशा’ फोंट इस्तेमाल करने लगा. बाद में संस्थान के लिये ‘अक्षर’ और ‘श्री-लिपि’ भी लिये जो आज भी कुछ विभागों में सफलता पूर्वक चल रहे हैं. जहां तक अंतरजाल (वैब) पर हिन्दी की बात है मैने अपनी पहली हिन्दी साइट 1998 में बनायी थी. उस समय वी.एस.एन.एल के डायल अप ऎकाउंट होते थे और वो सर्वर स्पेस देते थे आपको अपनी साइट होस्ट करने के लिये . उसी में अपनी साइट बनायी थी ‘शुशा फोंट’ इस्तेमाल करके जो केवल हमारे संस्थान के लोगों के लिये थी. मैने अपनी पर्सनल साइट 1999 में ‘एंजल फायर” में होस्ट की इसमें भी कुछ पेज हिन्दी के थे. फिर जियोसिटीज (geocities) में 2001 में अपनी साइट बनायी . उस समय जियोसिटीज (geocities) को याहू ने नहीं लिया था. उसी समय ई-ग्रुप्स में (जो कि अब याहू-ग्रुप है) अपना एक ग्रुप भी बनाया. मेरी साईट इसी ग्रुप की साईट थी. इसमें भी काफी पेज “शुशा’ में थे. लेकिन बाद में सदस्यों के कहने पर कुछ पेजों को ‘रोमनागरी’ में बदला ,क्योकि शुशा वाले पेजों को देखने के लिये फोंट डाउंलोड करना पड़ता था, और कुछ को पी.डी.एफ्. में. ये साइट आधे-अधूरे रूप में आज भी मौजूद है .

जहां तक लिनक्स का सवाल है लिनक्स का प्रयोग भी खूब किया लेकिन अधिकतर प्रयोग सर्वर पर ही किया डैक्सटौप पर नहीं . हम लोग ‘HP-Ux’ और ‘AIX’ पर काम करते थे तो ‘युनिक्स’ पर हाथ साफ था. सारे सर्वर युनिक्स पर ही थे. लिनक्स को जाना पी.सी.क़्यू. लिनक्स के माध्यम से और एक दो बार विंडोज पार्टीशन करने के चक्कर में अपने कीमती डाटा भी खो दिये . लिनक्स को डैस्क्टोप में केवल प्रयोग के लिये ही इस्तेमाल किया और लगभग सभी फ्लेवर पर काम किया . पी.सी.क़्यू. लिनक्स ,रैड हैट , सूसे , डैबियन , युबंटू और भी बहुत सारे . अपने संस्थान में लिनक्स को स्थापित किया . पूरा का पूरा मेल सिस्टम लिनक्स पर बदला . फायर-वाल के लिये पहले ‘चैक-पॉंईट’ और फिर ‘सूसे फायरवाल’ का प्रयोग किया , प्रोक्सी सर्वर के लिये ‘स्कविड’ का प्रयोग किया . ये सभी अभी भी मेरे पहले वाले संस्थान में सफलता पूर्वक चल रहे हैं .

जहां तक डैक्सटौप का सवाल है उसके लिये भी काफी प्रयास किया पर लिनक्स कभी भी मेरे पसंद का ओ.एस. नहीं बन पाया .वर्ड प्रोसेसिंग के लिये भी ‘मुक्त और मुफ्त’ विकल्प देखे. स्टार ऑफिस के व्यवसायिक होने से पहले उसे भी आजमाया और फिर ‘ओपन ऑफिस’ को भी . हाँलाकि मुझे तो ‘ओपन ऑफिस’ ठीक लगा पर मेरे संस्थान के लोगों के बीच नहीं चला . मुख्य कारण रही इसकी माइक्रोसौफ्ट वर्ड के साथ कम्पैटेबिलिटी . क्योकि अधिकतर लोग माइक्रोसौफ्ट वर्ड इस्तेमाल करते हैं और उनके द्वारा भेजी गयी सामग्री ओपन ऑफिस में कभी कभी नहीं खुलती.

जहां तक रही कम्प्यूटर पर मेरे हिन्दी लेखन की बात तो मैं माइक्रोसौफ्ट विस्टा और ऑफिस 2007 इस्तेमाल करता हूं . मैने विस्टा में ‘हिन्दी भाषा पैक’ और ऑफिस के लिये ‘इंडिक आई.एम.ई.’ लगा रखा है. कभी कभी बराहा भी इस्तेमाल कर लेता हूं. लिनक्स में यदि कभी हिन्दी का इस्तेमाल करना हो तो ऑनलाईन टूल इस्तेमाल कर लेता हूं. लिनक्स में आजकल फैडोरा और स्लेड (सुसे लिनक्स इंटरप्राइज डैस्कटौप 10 ) इस्तेमाल करता हूं.

इस चिट्ठे में मैं उन तकनीकी विषयों को छूना चाहता हूं जो कि एक संस्थान के लिये आवश्यक हैं और जिनके बारे में अभी भी हिन्दी चिट्ठा जगत में चर्चा नहीं होती जैसे ई.आर.पी, फायरवाल , नैटवर्किंग वगैरह वगैरह . हिन्दी कैसे लिखें बताने के लिये पंकज भाई का वीडियो है , सर्वज्ञ है , श्रीस श्रीश जी हैं और भी बहुत लोग हैं और फिर रवि जी तो हैं ही.

वैसे रवि जी आपका विंडोज विस्टा वाला लेख भी पढ़ा था उसमें आपने लिखा था कि विंडोज विस्टा में 3डी सपोर्ट है . मेरे हिसाब से ऎसा नहीं है . विंडोज विस्टा केवल एअरो इफेक्ट ही सपोर्ट करता है 3डी नहीं .ये तो अभी तक इनबिल्ट केवल लिनक्स में ही है.

शेष फिर…..

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